मंगलवार, 21 जुलाई 2009

जीवन निर्झर



क्यों मौन खड़े हो बतलाओ ?
क्यों रुके हुये हो समझाओ ?


क्या सुर्य - पवन - जल रुकते भय से ?

जीवन निर्झर सरिता स्वरूप,
यह बहता जल है स्वच्छ सरल


आरम्भ करो नूतन-नवीन,
रुकना कैसा तुम वीर सबल

तोड़ो कारा, तोड़ो प्रस्तर,
प्रारम्भ तुम्हारा उज्जवल है


माना बाधायें कम भी नहीं,
पर है असीम उत्साह तेरा

तुम करो प्रहार भीष्ण बल से,
तब द्वार खुलेंगे जीवन के


संगीत सुधा अविरल बहता,
है जीवन यह निश्चय चलता

जीवन निर्झर सरिता स्वरूप,
यह बहता जल है स्वच्छ सरल



7 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छे सकारात्मक भाव लिए रचना पसंद आई, बधाई.

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  2. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति और भाव के साथ लिखी हुई आपकी इस ख़ूबसूरत और शानदार रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

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  3. जब ऐसी रचनाएँ पढ़ती हूँ,तो, सकारात्मकता क़ुबूल करती हूँ...लेकिन अपने जीवन निर्झर को बहते रखने के लिए, जो अनगिनत मोड़ लिए, उन्हें भी याद कर लेती हूँ...बलशाली चट्टानों से टकराया भी नही जा सकता...ज़िंदगी सिखा देती है,की, किसी ज़िद में ऐसा टकराना महज़ बेवकूफी होती है..एक मोड़ लेके बहना असलियत...और समझदारी...

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  4. आरम्भ करो नूतन-नवीन,
    रुकना कैसा तुम वीर सबल ।
    तोड़ो कारा, तोड़ो प्रस्तर,
    प्रारम्भ तुम्हारा उज्जवल है।

    bahut achche!

    congratulation for your grand success in life.

    Best of luck for the future

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  5. आरम्भ करो नूतन-नवीन,
    रुकना कैसा तुम वीर सबल ।
    तोड़ो कारा, तोड़ो प्रस्तर,
    प्रारम्भ तुम्हारा उज्जवल है।
    ये पंक्तियां बहुत अच्छी लगी....

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  6. प्रोत्साहित कर मनोबल बढाने के लिये आप सभी लोगों का हृदय से आभार.

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