रविवार, 9 अगस्त 2009

मन


















ये मन बड़ा मतवाला है,
न होश में आनेवाला है
कभी इस डगर, कभी उस डगर,
रमता रहता है नगर - नगर


गाँवो की गलियों में दौड़े,
जैसे मस्त पवन मे भ्रमरें
फूल - फूल पर फिरता - फिरता,
मधुरस का पान करता


मन का दर्द रखो न मन में,
एक दिन विष बन जायेगा
मन की बात निकालो मन से,
कुछ कष्ट दूर हो जायेगा


मन क्या सोचे, मन क्या कर ले,
मन बहका ले, मन बहला ले
मन चाहे तो मीत बना ले ,
छोटे - बड़ो का भेद मिटा ले


मन , मन को मोह ले,
मन , मन ही रो ले
मन तड़पा दे , मन हर्षा दे ,
मन जीवन के गीत सुना दे


मन के बस में न होना रे,
मन को बस में कर लेना रे
मन, मष्तिस्क में जलता रहता है,
तब शिव का भष्म बनता है




(14 नवम्बर 1999)


23 टिप्‍पणियां:

  1. chandan Ji, chandan ki shitalta liye aapki ek aur rachana 'MAN' ,sachmuch man ko chhoo gayi . BADHAAYI HO

    Pratima S.

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  2. मन का दर्द रखो न मन में,
    एक दिन विष बन जायेगा ।
    सही कहा है
    खूबसूरत अभिव्यक्ति

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  3. मन के बस में न होना रे,
    मन को बस में कर लेना रे ।
    मन, मष्तिस्क में जलता रहता है,
    तब शिव का भष्म बनता है ।


    Behtarin....Bemishal...Badhai ho....

    उत्तर देंहटाएं
  4. मन का दर्द रखो न मन में,
    एक दिन विष बन जायेगा ।
    मन की बात निकालो मन से,
    कुछ कष्ट दूर हो जायेगा ।
    वाह, इस छोटी सी उम्र में इतना अच्छा लिख रहे हैं आप. बधाई

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  5. अत्यन्त सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपकी ये रचना बहुत अच्छी लगी!

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  6. 'मन' पर अच्छा रिसर्च किया है...
    अच्छी रचना के लिए बधाई...

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  7. गाँवो की गलियों में दौड़े,
    जैसे मस्त पवन मे भ्रमरें ।
    फूल - फूल पर फिरता - फिरता,
    मधुरस का पान करता
    ----------------/ye accha laga chayavaad aur adhunik yug ki kavita ka mishran.
    lagta hai bahut pada hai aapne...

    ..aur honi bhi chahiye.
    waise is kavita main sumitranandan pant ji ki jhalak dikhti hai.

    मन का दर्द रखो न मन में,
    एक दिन विष बन जायेगा ।
    मन की बात निकालो मन से,
    कुछ कष्ट दूर हो जायेगा ।
    वाह, इस छोटी सी उम्र में इतना अच्छा लिख रहे हैं आप. बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  8. मन के बस में न होना रे,
    मन को बस में कर लेना रे ।


    बहुत ही सुन्‍दर पंक्तियां बधाई

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  9. सच में ये मन बहुत ही चंचल होता है...........कभी इधर तो कभी उधर.......... दोड़ता रहता है .......... प्यार कभी तो तड़प का एहसास कराता है........... सुन्दर रचना

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  10. nice poem..
    but i feel,Mind is an illusion
    It has to be eliminted, not controlled

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  11. झाजी,
    आपकी सम्मति के लिए आभारी हूँ. पुण्यश्लोक नागार्जुन का स्मरण ही मन को पवित्र करता है ! यह संस्मरण तीन किस्तों में पूरा होगा, पूरा पढ़के अपना मंतव्य देंगे तो मुझे प्रसन्नता होगी. सप्रीत...

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  12. behad khubsoorat bhawabhiwyakti hai ..............bahut bahut aabhaar
    om arya

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  13. प्रत्युष खरे12 अगस्त 2009 को 10:12 pm

    दरअसल मन आज़ाद पंछी है ...बहुत खूब चंदन जी

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  14. दर्द कहाँ ,कब बाँटा किसीने?
    किसे फ़ुरसत के , लम्हा ,दो लम्हे ,
    रुक जाय , एक दास्ताँ सुन जायें ,
    बयानी शुरुभी हुई नही ,
    लो ,उठे और और चल दिए !

    Ye aapke liye!
    'ek sawal tum karo'is blog pe ' pe tippanee ke liye shukriya!
    Aapkee rachna pe kya kahun? mere pahle sab kah gaye!

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  15. मेरा मन हो रहा हैं आपसे बतियाने का .....................मनवा पर गज़ब कविता

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  16. badhai ho mitra es sundar rachana ke liye.....................aaj aapne mere mann ka mujhse parichay karwa diye.....shukriya

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