सोमवार, 28 सितंबर 2009

असमंजस

 

 

तुम हँसती हो

और

हजार – हजार फूल खिल जाते हैं

मेरे जीवन में ।

तुम रोती हो

और

फैल जाता है  अँधेरा

दूर -  दूर तक

मेरे जीवन में ।

और

जब तुम चुप रहती हो

निर्वात से भर जाती है

मेरी आत्मा ।

न जाने तुम

क्या चाहती हो ?

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

टोपीयां

 

 

 

बहुत हीं शांत, सौम्य और सज्जन

पुरुष थे वे लोग ।

और

पहने हुए थे

सच से भी ज्यादा

साफ़ और स्वच्छ कपड़े ।

लोगों को पहनाया करते थे

अपनी सफ़ेद टोपीयां ।

लोग आज भी

टोपीयां पहने हुए

पाये जाते है ।

 

 

 

                           (तस्वीर http://ngodin.livejournal.com से ली गयी है)

बुधवार, 23 सितंबर 2009

बंद पानी की बोतल

 

                             (गांव में ली गयी तस्वीर)  

 

उस साल

जब सूखा पड़ा था

मेरे गांव में ।

कुछ लोग आये थे

साफ आसमान से ।

बंद पानी की बोतल

बांट रहे थे वे ।

कह रहे थे

स्वच्छ, साफ और कीटाणुरहित

होता है यह जल ।

कीटाणु की जगह

लोग मर रहे थे 

भूख से  ।

बहुत ज़्यादा बारिश हुयी थी

उस साल

सूखे के बाद ।

बंद पानी की बोतल का

एक कारखाना और खुल गया था

मेरे गांव में ।

रविवार, 20 सितंबर 2009

विश्व सिनेमा – गाँधी(1982)

 पिछले तीन वर्षो में करीब 350 फ़िल्में देख चुका हूँ   । इनमें ज्यादातर अंग्रेजी और थोड़ी बहुत हिंन्दी और अन्य विदेशी भाषाओं में बनी फ़िल्में  हैं । हिन्दी में बहुत ही कम, गिनी चुनी फ़िल्में बन रही है आजकल जो देखने लायक है । बहुत दिनों से सोच रह था कि क्यों न कुछ फ़िल्मो की चर्चा की जाय जो मुझे अच्छी लगी । यह लेखन पूर्णतः मौलिक तो नहीं हो सकता है पर प्रयास करने में क्या बुराई है ।  बहुत सी  जानकारी इन्टरनेट से प्राप्त की जायेगी । अगर यह लेखन सार्थक हुआ तो आगे भी लिखूँगा । आईये आज करते है फ़िल्म गाँधी (Gandhi) की चर्चा ।

 

गाँधी (Gandhi)

 

महात्मा गाँधी हमारे देश के राष्ट्रपिता है । देश की स्वतंत्रता में उनके योगदान की चर्चा करने की आवश्यकता नहीं, हम सभी जानते है । मैं कुछ ऐसे लोगों से भी मिला हूँ जो इस बात को सिरे से नकारने की कोशिश करते है । देश के विभाजन का कारण वे महात्मा गाँधी को मानते है । यह भी सुना है कि अगर महत्मा गाँधी चाहते तो स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह को फँसी की सजा नहीं होती ।  जो भी हो सभी को अपने विचारों को  प्रकट करने की स्वंतन्त्रता है ।

सिनेमा को समाज का आईना भी कहते है । और आईना वही सच्चा है जो हमें अपना वास्तविक चेहरा दिखाये । गाँधी जी के जीवन पर बनी गांधी (GANDHI) एक उम्दा बायोग्राफिकल फ़िल्म है । 1982 में बनी रिचार्ड एटेन्बोरो (Richard Attenborough) द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म को   अगर आपने नहीं देखी है तो जरूर देखिये । 188 मिनट की यह फ़िल्म आपको शुरु से अंत तक बाँधे रखने में कामयाब रहेगी ।  गाँधी जी के किरदार को बहुत ही उम्दा तरिके निभाया है बेन किंगस्ले (Ben Kingsley) ने । गुजराती पिता और इंग्लिश माता की संतान बेन एक इंग्लिश अभिनेता है ।

फ़िल्म की शुरुआत इस कथन से होती है-

किसी व्यक्ति का जीवन एक वर्णन में नहीं समेटा जा सकता है । ऐसा कोई तरिका नहीं है कि हर वर्ष को सही महत्व दिया जा सके और युग निर्माण में हर घटना और व्यक्ति को समुचित महत्व मिले । किया यही जा सकता है कि दस्तावेज की भावना के प्रति  निष्ठा हो और मनुष्य के हृदय तक पहुँचने का कोई  मार्ग  निकाला जाय ।   

गाँधी फ़िल्म ने आठ आस्कर पुरस्कार जीते थे । फ़िल्म की शुरुआत महत्मा गाँधी की हत्या से होती है और उसके बाद पूरी फ़िल्म अतीत की घटनाओं पर केन्द्रित हो जाती है । फ़िल्म में लगभग सारी महत्वपूर्ण घटनाओ को दिखाया गया है । नमक सत्याग्रह और चम्पारण की घटना को सुन्दरता से दिखाया गया है । वह दृश्य बहुत ही महत्वपूर्ण है जब गाँधी जी मुहम्मद अली जिन्ना से देश का प्रधानमंत्री बनने का का प्रस्ताव रखते है, जिससे विभाजन को रोका जा सके । फ़िल्म में गाँधी जी कहते है -

मेरे प्रिय जिन्ना हम एक हीं भारतमाता की संतान है, हम भाई-भाई हैं और अगर तुम्हें डर है तो मैं उसे मिटाना चाहता हूँ । मैं अपने दोस्तों से समझदारी की मांग करते हुए कहता  हूँ , मैं पंडितजी से कहता हूँ कि वे रास्ते से हट जाये  । मैं चाहता हूँ कि तुम भारत के पहले प्रधानमंत्री  बनो, पूरी  कैबिनेट खुद बनाओ और सरकार के हर विभाग का मुखिया मुसलमान को  ही बनाओ ।

 

तब पंडित नेहरु कहते है कि-

बापू, मेरी और बाकी लोगो की ओर से अगर आप यही चाहते है तो हमें यह मंज़ूर होगा , लेकिन बाहर दंगा शुरू हो चुका है क्योंकि हिंदुओ को आशंका  है कि आप ज़्यादा दे देंगे ।  और अगर आप  ने ऐसा किया तो फिर इसे कोई नहीं रोक पायेगा, कोई नहीं  ।

 

इसके बाद जिन्ना का यह कथन कि अब फैसला आपके हाथ में हैं बापू । आप आज़ाद हिन्दुस्तान और आज़ाद पाकिस्तान चाहते हैं या आप गृह युद्ध चाहते हैं ?”  सुन गाँधी हतप्रभ और मूक रह जाते है । इस दृश्य के बाद भारत और पाकिस्तान को स्वतंत्र होते हुये दिखाया जाता है । 

फ़िल्म के  अंत में महात्मा गाँधी की अस्थियाँ गंगा में प्रवाहित की जाती हुयी दिखायी जाती है और पार्श्व से उनकी यह आवाज प्रतिध्वनित होती है -

जब भी मै निराश होता हूँ और ऐसा लगता है कि सबकुछ गलत है  तब मैं याद करता हूँ कि सत्य और प्रेम की हमेशा जीत हुई है । इतिहास में ऐसे शोषक और हत्यारे भी हुऐ है जो एक समय अदम्य लग रहे थे पर अंत में उनका भी पतन हुआ । इस बात को हमेशा याद रखना ।

अगर आप फ़िल्म प्रेमी है तो आपने यह फ़िल्म जरूर देखी होगी या नहीं तो फिर देखेंगे । इस फ़िल्म से संबधित आपके अपने अपने विचार हो सकते है । आपके इन विचारों का यहाँ स्वागत है । कोई भी त्रुटि (इसकी संभावना हमेशा बनी ही रहती है) हो तो जरूर बताये ताकि लेखन में सुधार किया जा सके । इसी कड़ी में एक और नयी फ़िल्म की चर्चा लेकर वापस आऊंगा । आप सभी को  नवरात्रि और ईद की हार्दिक शुभकामनायें ।

 

शनिवार, 19 सितंबर 2009

दो मैथिली अगड़म-बगड़म !!!!!

               (फोर्ट कोच्चि में लिया गया फोटो)

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माछ- भात तीत भेल

दही- चिन्नी मिठ्ठ भेल

खाकऽऽ टर्रर छी     ।

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कारी मेघ

कादो थाल

झर झर बुन्नी

चुबैत चार

 

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(चिन्नी= चीनी, मिठ्ठ= मीठा, कारी= काला, बुन्नी= बरसात, तीत= तीखा, चुबैत= टपकना, चार= छप्पर)

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

अपना हीं घर वह तो नहीं

 

गमगीन है हर आदमी

क्यों खो गया सुख चैन ।

क्यों रोकता कोई नहीं

इस जंग को तूफान को ।

क्यों बह रहा है नालियों में

खून मेरे अपनो का ।

शाख  पर जो स्वप्न थे

क्यों झड़ गया वह पर्ण है ।

क्यों हो रहा नंगा यहाँ सब

कैसी मची हुरदंग है ।

जो चले थे हम जलाने

आंगन किसी और का ।

वह दूर से उठता धुँआ

अपना हीं घर वह तो नहीं ।

क्यों सड़क है सुनसान

क्यों गलियाँ है खामोश ।

यह शहर अब

जिंदा लोगो की

कब्रगाह बन चुकी है ।

(चित्र गूगल सर्च से)

 

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

पथभ्रष्ट

 

अपनी मुक्ति का मार्ग

ढूँढते हुऐ

यहां तक

आ पहुँचे थे

वे लोग ।

पूछ रहे थे

पता ।

कौन सा

मार्ग

बताता 

पथभ्रष्ट  मैं । 

जो मार्ग

बताया मैनें

वह ले गयी उन्हें

स्वंय तक ।

अब वे भी

मेरी तरह

पथभ्रष्ट हैं ।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

केरल, ओणम का त्योहार और महाबली-२

Kathakali_of_kerala भारत में जितने भी महत्वपूर्ण त्योहार और पर्व मनाये जाते है, सभी के पीछे कोई न कोई दंतकथा या पौराणिक कथा छिपी  है I पिछली पोस्ट केरल, ओणम का त्योहार और महाबली में हमनें केरल मे मनाया जाने वाला पर्व ओणम की चर्चा की थी I ओणम त्योहार के मनाये जाने के पीछे भी  पौराणिक कथायें छिपी हुई है I  अनेक पौराणिक कथाओं में राजा महाबली की कहानी सबसे प्रचलित और महत्वपूर्ण है I

ऐसा कहा जाता है की कभी महाबली केरल के प्रातापी राजा हुआ करते थे I महाबली को मावेली और ओनथप्पन के नाम से भी जाना जाता है I राज्य की जनता उन्हें बहुत ही प्यार और सम्मान देती थी I चारो तरफ़ न्याय और सत्य का बोल बाला था I  जनता बहुत ही खुश थी I

विरोच्छन महाबली के पिता और प्रहलाद पितामह थे I असुर कुल का होते हुए भी महाबली भगवान विष्णु के प्रचन्ड भक्त थे I अपनी शक्ति और वीरता के कारण उन्हें महाबली चक्रवर्ती कहा गया I राजा महाबली के बढते हुए सम्मान और प्रताप को देखकर देवताओ में खलबली मच गयी I वे राजा महाबली के पतन का मार्ग ढूंढने लगे I सहायता के लिये वे देवमाता अदिती के पास पहुचें, ताकि भगवान विष्णु की सहायता ली जा सके I

कहा जाता है की महाबली बहुत ही दानवीर थे I जो कोई भी उनके पास कुछ मांगने आता , वे उसकी ईच्छापूर्ती जरूर करते I परिक्षा लेने के उद्देश्य से भगवान विष्णु ने बौने ब्राह्मण वामन का रूप धारण कर महाबली के पास पहुचें I वामन ने राजा महाबली से जमीन का एक छोटा स टुकड़ा मागां तो महाबली ने कहा आप अपनी ईच्छानुसार जितनी जमीन चाहे ले लें I वामन ने कहा कि उन्हें बस तीन कदम जमीन चाहिये I पहले तो महाबली बहुत ही चकित हुए पर तुरन्त अपनी सहमती दे दी I

असुर गुरू शुक्राचार्य ने तुरन्त महसूस कर लिया की यह कोई साधारण पुरुष नहीं है और महाबली को चेतावनी दी I पर दानशील राजा ने कहा कि एक सम्राट के लिये अपने वचन से पीछे हटना पाप के समान है I महाबली भगवान विष्णु को एक बौनें ब्राह्मण के रुप में होने की कल्पना नहीं कर पाये I

जैसे ही महाबली ने भूमि देने का वचन दिया वामन का शरीर बढ़ने लगा और पूरे ब्रह्मान्ड के आकार का हो गया I वामन ने एक कदम में पूरी धरती को और दूसरे कदम में पूरे आकाश को नाप लिया I तब वामन ने पूछा की वह अपना तीसरा कदम कहां रखे I अब जाकर महाबली को विश्वास हुआ की यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं है I विनम्रता से वामन के पैरो पर अपना सर रखते हुए महाबली ने कहा की वह अपना तीसरा कदम उसके सर पर रख दे ताकि उसके वचन का मान रह जाये I वामन के पैर रखते ही महाबली पाताल लोक चले गये I महाबली ने वामन से अपनी सही पहचान प्रकट करने के लिये अनुरोध किया I तब भगवान विष्णु अपने वास्तविक भव्य रूप में आकर महाबली से वरदान मांगने के लिये कहा I

अपनी प्रजा के प्रति आगाध प्रेम के कारण महाबली ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि उसे वर्ष में एक बार अपने राज्य केरल आने की अनुमती दी जाय I भगवान विष्णु बहुत ही प्रसन्न हुए और कहा की सबकुछ खोते हुए भी महाबली को विष्णु और उनके भक्तों द्वारा हमेशा प्रेम किया जायेगा I

यही ओणम का दिन है जब महाबली वर्ष में एक बार केरल भ्रमण करने के लिये आते है  और केरल की जनता उनका भरपूर स्वागत करती है I

 

(वैसे तो यह मात्र एक पौराणिक कथा है और इसकी सत्यता की परिक्षा नहीं ली जा सकती I पर सबसे बड़ी चीज होती है विश्वास I और जब हम विश्वास (Believe) करने लगते है तब उर्जा का अथाह श्रोत खुल जाता है I मनुष्य का जीवन भी तो इसी विश्वास पर टिका हुआ है)

                                                              (चित्र गूगल सर्च से साभार)

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