मंगलवार, 15 सितंबर 2009

अपना हीं घर वह तो नहीं

 

गमगीन है हर आदमी

क्यों खो गया सुख चैन ।

क्यों रोकता कोई नहीं

इस जंग को तूफान को ।

क्यों बह रहा है नालियों में

खून मेरे अपनो का ।

शाख  पर जो स्वप्न थे

क्यों झड़ गया वह पर्ण है ।

क्यों हो रहा नंगा यहाँ सब

कैसी मची हुरदंग है ।

जो चले थे हम जलाने

आंगन किसी और का ।

वह दूर से उठता धुँआ

अपना हीं घर वह तो नहीं ।

क्यों सड़क है सुनसान

क्यों गलियाँ है खामोश ।

यह शहर अब

जिंदा लोगो की

कब्रगाह बन चुकी है ।

(चित्र गूगल सर्च से)

 

22 टिप्‍पणियां:

  1. आपका हिन्दी में लिखने का प्रयास आने वाली पीढ़ी के लिए अनुकरणीय उदाहरण है. आपके इस प्रयास के लिए आप साधुवाद के हकदार हैं.

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  2. वह दूर से उठता धुँआ
    अपना हीं घर वह तो नहीं ...
    bahut depth mein likha hai bhai... bahut acche..

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  3. यह शहर अब

    जिंदा लोगो की

    कब्रगाह बन चुकी है ।

    सबसे सटीक बात इन पंक्तियों में कही .. पर एक शहर नहीं .. प्रत्‍येक शहर हो गया है ऐसा!!

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  4. chandan ji bahut gehre bhaav han...

    वह दूर से उठता धुँआ
    अपना हीं घर वह तो नहीं ...


    apna to ye haal hai ki...
    "chulhe nahi jalaye, ya basti hi jal gayi?
    kuch roz ho gaye ab uthta nahi dhoona."

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  5. कमाल, शानदार, अद्भुत.... क्या कहूं, शब्द कम हैं. आप मात्र २४ वर्ष की की उम्र में ऐसा सोचते/लिखते हैं, हर्ष की बात है. आप जैसी सोच रखने वाले १००० युवा अगर मुखर हो जाएँ तो शायद इस देश की दशा और दिशा ही बदल जाए. यह तेवर बनाये रखें, लेखन को इसी स्वर की आवश्यकता है.

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  6. वह दूर से उठता धुँआ
    अपना हीं घर वह तो नहीं.........

    AAJ KE HAALAT KA YATHAART CHITRAN HAI .... HAR KOILAGA HAI MAARAMAARI MEIN ... EK DOOJE KO KAATNE MEIN ..... LAJAWAAB LIKHA HAI

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  7. चंदन कुमार झा जी मै आप का आभारी हु की आप ने मेरी कविता की सराहना की लेकिन उस से भी ज्यादा खुसी मुझे
    आप की "अपना हीं घर वह तो नहीं " पढ़ कर हुई .सही मायनों में अपने जज्बातों को के साथ आप ने अपने ही साथ ही नही अपने जैसे सोच रखने वाले सभी लोगो की की भावनाओ के साथ न्याय किया है .मुझे खुसी है इस बात की . अगर मै इस से ज्यादा आप की तारीफ करूँगा तो आप को लगेगा की मुझे आप से कुछ लालच है इस लिए अगली तारीफ आप की अगली अछि कविता के लिए बचा के रखता हु .आप की अगली कविता के इंतजार में - सर्वेश दुबे

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  8. चिंतन युआ का सदा ही कुछ ऐसा ही रहा है.
    यही युआ, यही चिंतन नौकरी करते ही ऐसे ही हालातों का जिम्मेदार हो जाता है., जिसे फिर से नया युआ कुछ यूँ ही धिक्कारता है...... इतिहास गवाह है........

    सुन्दर प्रस्तुति.
    भावनाओं की कद्र करता हूँ......... संघर्ष जारी रहना चाहिए बस यही दुआ है...............

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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  9. क्यों सड़क है सुनसान

    क्यों गलियाँ है खामोश ।


    यह शहर अब

    जिंदा लोगो की

    कब्रगाह बन चुकी है ।


    bahut sahi chandan.......

    zinda logon ki kabr ban chuki hai....... v gud

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  10. बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने! सच्चाई को बखूबी प्रस्तुत किया है!

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  11. बहुत अच्छा चन्दन भाई....
    Keep it up !

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  12. वह दूर से उठता धुँआ

    अपना हीं घर वह तो नहीं ।..aisa hi hota hai...hum kabhi soch bhi nahi sakte ki hmare sath kuchh bura bhi ho sakta hai....apki kavita bahut hi achhi lagi....

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  13. सच में कहीं कुछ गड़बड़ हुये जा रही है और समझ में नहीं आ रहा। यह दशकों से हो रहा है।

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  14. "वही तो है अपना घर
    हम हो रहे खुद बेघर
    पर हमें नहीं है
    इस बात की खबर"

    चन्दन कुमारजी क्या यह सही नहीं है
    की अपने ही घर से धुआं उठ रहा है
    बहुत ही खुबसूरत ........
    जरी रखिये..

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  15. बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण रचना लिखा है

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  16. Life has become so. Constant fear, sorrow grip all. Everyone longs for security but arson, looting, bandhs and rioting have made life unlivable.

    Splendid expression of thought in simple words.

    Thanks

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