सोमवार, 28 सितंबर 2009

असमंजस

 

 

तुम हँसती हो

और

हजार – हजार फूल खिल जाते हैं

मेरे जीवन में ।

तुम रोती हो

और

फैल जाता है  अँधेरा

दूर -  दूर तक

मेरे जीवन में ।

और

जब तुम चुप रहती हो

निर्वात से भर जाती है

मेरी आत्मा ।

न जाने तुम

क्या चाहती हो ?

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