बुधवार, 18 नवंबर 2009

आम की बातें

 

आज कुछ बातें आम की हो जाये । गाँव में अब आम के ज्यादातर पौधे हर साल नहीं फलते है । इसका कारण पर्यावरण प्रदूषण है या फिर जलवायु परिवर्तन ? या यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है ? इस बार जब मई-जून में गाँव गया था तो कुछ आम के पेड़ फले हुए थे अतः अगली गर्मियों में उनके पुनः फलने की बहुत कम हीं सम्भावना है ।

 

मैनें देखा है गांव में आम का फलना किसी उत्सव से कम नहीं होता । आम के पेड़ में मंजर आने से लेकर फल टूटने तक । पेड़ की देखभाल, आम के महीने में रात भर जागकर रखवाली, गिरे हुए आमों को इकट्ठा करना सबकुछ एक जुनून की तरह होता है । ज्यादातर आम के पेड़ो की रखवाली बँटाई व्यवस्था (ओगरवाही) के आधार पर होती है । पेड़ की रखवाली पेड़ का मालिक खुद नहीं करता है । पेड़ की रखवाली किसी योग्य व्यक्ति को दे दी जाती है । क्षेत्रिय भाषा मैथिली में उसे ओगरवाह / रखबार कहते है ।  इसके एवज में वह एक चौथाई आम लेता है । बगीचे में बाँस और फूस से बना छोटा सा मचान डाल दिया जाता है । आने वाले दो-तीन महिने के लिये यही झोपड़ी घर-आंगन-दालान बन जाती है । 

 

 

जब भी आम के महिने में आँधी या तूफान आता है लोग-बाग निकल पड़ते है बगीचे में आम बीछने । यह एक बेहतरीन अनुभव है । रात के घने अँधेरे में आप आम के पीछे भागते रहते है । पूरा शरीर भींगा हुआ और कीचड़ से लतपथ रहता है । कई बार तूफान में पेड़ की डाल टूटकर गिर परती है । खतरनाक है यह पर फिर भी इसका अपना अलग रोमांच है । इकट्ठा किये गये आम का ज्यादातर उपयोग अचार बनाने में होता है क्योंकि ये टूटे-फूटे रहते है ।

अभी भी हमारे यहाँ मिथिलांचल में सबसे ज्यादा आम के ही बाग लगाये जाते है । आम की सैकड़ो प्राजातियां मिल जायेगीं आपको । दशहरी, केरवी, फ़जली, कलकत्तिया, बंबईया, मालदह, लंगड़ा बनारसी, सिंदूरी, नकूबी, लाटकम्पू, जर्दालू, रामभोग, लतमुआ, कृष्णभोग, सुपरिया, कर्पुरवा, नैजरा और न जाने कितने ही स्थानीय नाम वाले आम है ।                                                                                                    

  

आजकल कीटनाशकों का बहुत ज्यादा प्रयोग हो रहा है ।  इसके बहुत हीं अधिक दुष्प्रभाव होते है । पर अन्य विकल्प भी तो नहीं । जब बहुत हीं तेज धूप और गर्मी और पड़ने लगती है तो आम के मंजर सूखकर झरने लगते है । इससे बचने के लिये मंजरो पर पानी का छिड़काव किया जाता है ।  कृषि विश्वविद्यालयों में इन सब चीजों पर रिसर्च तो हो रहा है पर सही लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाता है । अभी भी इस क्षेत्र में आम का बहुत कम व्यवसायिकरण हुआ है । शेष बातें फिर कभी ।

13 टिप्‍पणियां:

  1. दशहरी, केरवी, फ़जली, कलकत्तिया, बंबईया, मालदह, लंगड़ा बनारसी, सिंदूरी, नकूबी, लाटकम्पू, जर्दालू, रामभोग, लतमुआ, कृष्णभोग, सुपरिया, कर्पुरवा, नैजरा
    Baap re itne tarah ke aam...
    bahut sundar likha hai aalekh..aut din baad shabd suna 'Ogarwaah' accha laga..Ogarna to sabhi istemaala karte hain dainik jeewan mein ..lekin hamko to sune hue zamana ho jaata hai..
    bahut sundar likha...
    Bhaut din baad dekhe tumko man bahut khush hua dekh ke...
    likhte raho...
    Aasheerwaad..
    Didi...

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  2. आम के बारे में अच्छी जानकारी दी आपने.
    आम भी तो आजकल 'आम' नहीं रहा.

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  3. सभी आमों के नाम सुनकर मूँह में पानी आ गया. बहुत उम्दा आलेख भाई!!

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  4. in aamon ka naam suk kar paani aa gaya bhai hamaare muh mein bhi .... achaa likha hai ...

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  5. bahut maja aata tha apna hi bageecha ogarne mein.. aur aam to ek chauthai se bahut jyada kha lete the hamlog.. kya din the wo.. 5 saal se wo maldah aam dikhe nahi hain... aur pata nahi ab kab mauka mile...

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  6. इस मौसम में आम के जिक्र ने कई मीठी यादें दिला दीं...आपकी चिंता जायज है...अब गाँवों में आम का उत्पादन अधिक नहीं होता...फसल भी कम आती है...और अमिया से पके आम तक का सफ़र तो बहुत कम आम तय कर पाते हैं.....आम के पेडों की अच्छी देखभाल नहीं हो पाती,सही समय पर पेडों की छटाई और खाद पानी वगैरह नहीं मिल पाते...गाँव में यह एक अच्छी कमाई का जरिया था..

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  7. बहुत ही अच्छी और ज्ञानवर्धक जानकारी प्राप्त हुई! आम तो मुझे बेहद पसंद है! आम के बारे में सुनकर और तस्वीर देखकर अभी खाने का मन कर रहा है!

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  8. इस मौसम में आम के जिक्र ने कई मीठी यादें दिला दीं...आपकी चिंता जायज है...अब गाँवों में आम का उत्पादन अधिक नहीं होता...फसल भी कम आती है...
    AATI SUNDER

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  9. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com
    Email- sanjay.kumar940@gmail.com

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  10. अरे चंदन, मजा आ गया भाई तुम्हारा ये आम-वृतांत पढ़ कर। "तुम" कह रहा हूं कि छोटे हो मुझसे और मेरे गांव वाले हो....सौराठ मेरा ननिहाल है।

    "ओगरबा" पढ़ कर खूब मजा आया...अभी सहरसा में घर पर तुम्हारा पोस्ट सबको पढ़कर सुना रहा हूं।

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  11. चंदन जी,

    आम की खुश्बू से तरबतर हो गया और स्वाद लेने की ललक जाग उठी है।

    अब तो आप ही कुछ सुझाईये।

    सादर,


    मुकेश कुमार तिवारी

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