रविवार, 6 दिसंबर 2009

निर्माण

 

मैं कह देता हूँनिर्माण

अपनी बात ।

जब भी मन करता है

कह देता हूँ ।

 

मैं नहीं जानता कि

तुम तक

पहुँच भी पाती है

मेरी आवाज या नहीं  ।

फिर भी

चुप नहीं रह पाता मैं ।

 

मुझे पता है कि

मेरी आवाज बहुत धीमी है ।

मुझे पता है कि

जब भी बोलता हूँ

शब्द लड़खड़ा जाते है मेरे ।

 

पर क्या

इसलिये मैं चुप हो जाऊँ

कि मैं दहाड़ नहीं सकता ।

मैं चढ़ नहीं सकता पहाड़ों पर

तो क्या ?

 

मैं बहता रहूँगा नदियों में

कल-कल की ध्वनि बनकर

जो उतरकर आती है

इन्हीं पहाड़ों से ।

 

मेरे विचारों पर

खामोशी की परत

जरूर चढ़ी है

पर मैं इन्हें बदल दूँगा

वक्त की ऊर्जा में ।

 

जब भी मैं चुप होता हूँ

बहुत करीब हो जाता हूँ

तुमसे !!!

आओ निर्माण करें ।

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