रविवार, 13 जून 2010

मेरे अतीत का आँगन

आह !!!

कैसा है यह दुःसाहस,

देखता हूँ मुड़कर मैं,

अपने अतीत के उस खण्डहर को,

अपने आँगन में,

सर झुकाए मैं खड़ा था ।

टूट रहा था विश्वास,

खत्म हो रहे थे सारे सम्बन्ध,

मेरे मन के उस आँगन में ।

और

मिट चुकी थी

भविष्य की रेखाऐं

मेरे छोटे-छोटे हाथों से ।

मुझे याद नहीं,

माँ का आँचल

जहां मैं अपने आँसू पोछ सकता ।

मुझे अब याद नहीं,

पिता का नर्म स्पर्श ।

मेरा बचपन,

टूट रहा था ।

और मैं-

सर झुकाए आज भी खड़ा हूँ

अतीत के उस आँगन में ।

बुधवार, 9 जून 2010

क्यों…?

खाली रह जाता हूँ मैं,

बार-बार ।

जितना भी तुम भरती हो,

मैं खाली होता जाता हूँ ।

तरल होता जाता हूँ,

पल-पल,

हमेशा,

मैं ठोस होने की कोशिश में ।

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