मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

अंत में

मैनें देखा नहीं है,

उगते हुए सूरज को वर्षों से ।

छिपकर बैठा है,

प्राचीन शैतान !!!

कोशिश करता हूं जब भी…

कि अपनी आंखे खोलूं,

नींद में डूब जाता हूं मैं ।  

देखता हूं जब भी,

दूर से आते हुए प्रकाश को,

और फ़िर,

विकृत और सिमटते हुए प्रतिबिंब को,

सच की तलाश में जुट जाता हूं मैं ।

मेरी तरह,

कई लोगो नें,

देखा नहीं है उगते हुए सूरज को,

वर्षो से ।

और हम मान बैठे है….

हमें बचा लिया जायेगा ।

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