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शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

एक प्याली चाय

चाय,

एक प्याली चाय

सिर्फ चाय नहीं

यह देती है जीवन

उस मरे हुए आदमी को

जो बच निकलता है

सुबह की खूबसूरत मौत से ।

और फिर तैयार होता है

एक आनेवाली मौत के लिये ।

अगर आप कहेंगे कि

चाय पीना, एक नशा है

तो मंजूर है हमें यह नशा ।

एक प्याली चाय

आप खरीद सकते है

दो या तीन रुपये में ।

मिल जायेगी

एक चाय की दूकान

आपको किसी भी बाजार में

बस स्टाप पर

या किसी चौक पर ।

या फिर

अगर आप जानते है

चाय बनाना

तो यह आपकी महानता है ।

यहाँ ज्यादातर लोगो को

नसीब हो जाती है चाय ।

कुछ लोग सुबह के नास्ते में

निगल जाते है

रात की बची हुई सूखी रोटियां

चाय के साथ ।

कुछ लोगों को

‘दानेदार’ या ‘लीफ़-टी’ पसंद है ।

कुछ ‘डस्ट’ से ही चला लेते है

अपना काम ।

कुछ लोग पीते है चाय

स्वाद के लिये

और कुछ  

महज टालने के लिये थोड़ी देर तक भूख ।

आजकल चाय भी बहुत

महंगी हो गयी है ।

बुधवार, 11 नवंबर 2009

चुप हो जाओ

 

 

 

 

 

 

 

 

 

कि एक हवा चली है

चुप हो जाओ

बह जाओ  ।

कि एक फूल खिला है

चुप हो जाओ

खिल जाओ ।

कि एक दीप जला है

चुप हो जाओ

जल जाओ ।

कि एक बादल निकला है

चुप हो जाओ

बरस जाओ ।

कि एक पत्ता टूटा है

चुप हो जाओ

खो जाओ ।

कि एक सूरज निकला है

चुप हो जाओ

भर जाओ ।

कि एक प्रेम मिला है

चुप हो जाओ

झुक जाओ ।

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2009

कि बन जाये आत्मा

 

बहना नदी की तरह

निर्विरोध और तीव्र वेग लिये

कि बन जाये आत्मा

एक नदी चंचल

और मिटा दे अपना अस्तित्व

मिलकर अपने इष्ट से ।

खिलना पुष्प की तरह

महक और सौंदर्य लिये

कि बन जाये आत्मा

एक पुष्प गुच्छ

और कर दे अपना जीवन समर्पित

अपने प्रिय के आंचल में ।

चलना पवन की तरह

वेग और उन्मांद लिये

कि बन जाये आत्मा

एक हवा का झोंखा

और टकराकर किसी ऊँचे पर्वत से

झर जाये झर-झर निर्झर ।

होना विशाल महासागर की तरह

लहरें और कोलाहल लिये

कि बन जाये आत्मा

एक सागर अथाह

और लाख हाहाकार लिये भी

अंदर से हो शांत और गहरा ।

तपना सूरज की तरह

लावा और उष्मा लिये

कि बन जाये आत्मा

एक सूरज चमकदार

और स्वयं जलते हुये भी अनवरत

भर दे जीवन कण कण में ।

(भैया रावेंद्रकुमार रवि द्वारा दिये गये सुझाव के अनुसार उपरोक्त कविता को सम्पादित कर पुनः प्रकाशित किया  गया है )

मंगलवार, 20 अक्तूबर 2009

ख़्वाब, परिंदा और कहानी

 

(केरल में पालघाट दर्रा जो केरल को तमिलनाड़ू तथा कर्नाटक से जोडता हैं और सुन्दर पहाड़ी का दृश्य)

 

 

 

 

 

 

आधे अधूरे ख़्वाब

और यह सिमटता जहान

अपने हीं अन्दर

बार बार

खुद को

ढूँढता रहा हूँ मैं ।

 

**********************************

 

वक्त का परिंदा

और यह छोटी सी जिंदगी

न जाने कौन सी अँधेरी गली में

बार बार

खुद को

खोता रहा हूँ मैं ।

 

**********************************

 

अधूरी यह कहानी

और अनकहे शब्द कितने

अपनी ही राह का काँटा

बार बार

खुद को 

बनाता रहा हूँ मैं ।

शनिवार, 17 अक्तूबर 2009

दीपावली

मैं तम से भरा अज्ञानी मां

एक दीप जला दो जीवन में मां

मन के कपाट मेरे बन्द है मां

मेरा मार्ग प्रकाशित कर दो मां ।

 

एक ज्योति जला दो जीवन में

फैला दो उजाला जीवन में

है सघन अंधेरा जीवन में

कुछ रंग भर दो इस जीवन में ।

खिले फूल कमल सा सबका जीवन

महकें फूलों सा यह मन उपवन

फैले दूर दूर तक ज्ञान की हरियाली 

भर दे प्रकाश जीवन में सबके दीपावली ।

 

 

(आप सभी को दीपावली पर्व की अनेको अनेक शुभकामनायें  !!!)

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

ऐसा क्यों होता है ?

 

कम नहीं था

वह प्रेम

जो दिया मैंने तुमको ।

माना कि

तुम्हारी कुछ मजबूरियाँ थी ।

पर

चाहती थी मैं भी

सबकुछ बांटना

तुम्हारा दुःख- सुख

और तुम्हारा द्वन्द ।

मानते हो  न तुम

कि

अधिकार था यह मेरा ।

पर तुम्हारा अहम

और तुम्हारी मजबूरी ।

तुम्हारी मजबूरियों से लदे

कंधे पर अपना सिर

रख न पायी मैं

रो न पायी मैं ।

मेरे गर्म आंसू

पिघला न पाये

तुम्हारे जमें हुए खून को ।

शायद यह तुम्हारी महानता थी

या कुछ और ।

अभिशप्त है मेरा जीवन

तुम्हारे इस झूठ को

जीने के लिये ।

माना कि

तुम्हारी परिधि से टूटकर

मै पूर्ण न हो पायी

पर यह सोचो

कितने अकेले

कितने विकल हो

तुम भी

आज तक ।

रह गयी अधूरी मैं

और अधूरे तुम भी

आज तक ।

रविवार, 11 अक्तूबर 2009

मेरे होने का मतलब

 

जिन्दगी की प्रयोगशाला में  बहुत सारे प्रयोग चलते रहते हैं । कुछ मेरे अंदर  चल रहे है । कुछ आपके अंदर भी चल रहे होंगे । देखते है ये प्रयोग सफल होते है की नहीं । वैसे  इन प्रयोगों के बिना जीवन का बहुत अर्थ भी नहीं । सफलता और असफलता तो आनी जानी रहती है । आत्मा तो बस चलने में है, निर्विकार, निर्भीक और निर्विरोध !!!!

(गाजर के फूल)

रात सिमटती गयी,

दिन निकलता गया,

रंग भरते गये,

मैं निखरता गया ।

संग तेरा जो पाया,

तो लौ जल गयी,

रौशनी मेरे अंदर,

भरती ही गयी ।

 

तुम हीं तुम हो यहाँ 

मैं कहीं भी नहीं,

मेरे होने का मतलब,

तुम ही तो नहीं ।

शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

तूफान के बाद !!!

 

 

 

 

 

 

 

 

देखा तो बरसात हुई थी,

बाहर सबकुछ भींग चुका था,

अन्दर अभी भी सूखा था,

आँखे अभी भी गीली हैं ।

बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

फूल का कहना सुनो

 

 

 

 

(चित्र- भैया रावेंद्रकुमार रवि)

 

 

 

 

 

फूल का कहना सुनो

यह कहता कुछ नहीं

पर

तुम सुन सकते हो

सबकुछ ।

उल्लास, प्रेम, करुणा, दर्द

सबकुछ ।

तुम सुन सकते हो

जीवन के हर क्षण

रंगों का कण-कण

तुम सुन सकते हो

सबकुछ ।

तुम देख सकते हो

इसमें जीवन का

असीम सौंदर्य ।

फूल

बगीचे में खिला हो

या फिर

खिला हो

किसी ऊँचे दरख्त पर ।

या फूल हो जंगली

फूल तो फूल है ।

यह खिल जाता है कहीं भी

चाहे

कांटे, कीचड़ और पहाड़ हो

या फिर हो शुष्क रेत

यह खिल जाता है ।

जीवन की मुस्कान लिये

इसलिये

फूल का कहना सुनो ।

सुनो

चुपचाप सुनो………

 

 

(बहुत ही हर्ष के साथ सूचित करना चाहता हूँ कि मेरे ब्लाग ‘गुलमोहर का  फूल’ की समीक्षा 4 अक्टूबर को iNext हिन्दी समाचार पत्र में ‘गुलमोहर की छांव’ नामक शीर्षक से प्रकाशित हुई थी । समीक्षा करने के लिये मैं आदरणीय श्रीमती प्रतिभा कटियार जी का हृदय से आभारी हूँ । मैं सभी सम्माननीय ब्लागरों एवं प्रिय मित्रों को हृदय से धन्यवाद प्रस्तुत करना चाहता हूँ जिन्होंने अपना बहुमूल्य समय देकर मेरा उचित मार्गदर्शन किया और मुझे अपार मानसिक शक्ति प्रदान की । मैं श्रीमान बी एस पाबला जी का आभारी हूँ जिन्होनें इस समाचार को अपने ब्लाग प्रिंट मीडिया पर ब्लाग चर्चा पर प्रकाशित किया । अगर मैं आप सभी शुभचिंतको का नाम लिखकर आभार प्रकट करूं तो सूची बहुत लम्बी हो जायेगी अतः इसके लिये मुझे क्षमा करें । एक बार पुनः आप सभी को कोटि-कोटि धन्यवाद)

शनिवार, 3 अक्तूबर 2009

प्रेम का यह गीत, केरल में बरसात और गाय

अभी अभी जैसे हीं घर के बरामदे की बत्ती जलाई कि एक गाय उठकर खड़ी हो गयी और उसके पीछे उसका बच्चा भी था । अभी यहाँ केरल में तीन दिनों से झमाझम बरसात हो रही है । यहां बैठा मैं पोस्ट लिख रहा हूँ और बाहर वर्षा में  नारियल, केले, कटहल और काली मिर्च के पौधे बेतहासा झूम रहे है । बरामदे की बत्ती जलाते ही गाय डर कर खड़ी हो गयी । बरसात से बचने के लिये वह यहाँ आकर बैठ गयी थी पर उसका बच्चा बाहर भींग रहा था । मोबाईल कैमरे से मैनें कुछ चित्र भी ले लिये । रसोई से एक रोटी लाकर, आधी रोटी गाय को खिलायी और और जैसे हीं दूसरी आधी रोटी बच्चे को खिलाने की कोशिश की, कि दोनों भाग खड़े हुए । अब दोनों बाहर बरसात में भींग रही होंगी । इसका पाप भी  मेरे सिर ही जायेगा । एक पाप और सही ।

आज शाम में माँ से बात हुई थी । गांव में वर्षा नहीं हो रही है । पता नहीं खेतों में खड़े धान के पौधों पर क्या बीत रही होगी । गृहस्थ मर रहा है । इन्द्र देवता की मेहेरबानी देखिये । जब भी गांव जाता हूँ मैं, वर्षों से एक नहर बनते देखता हूँ । जब से होश संभाला है, करीब 15 वर्ष से देख रहा हूँ, यह नहर बन हीं रही है । पता नहीं इस नहर का पानी कब खेतो में पहुँचेग़ा । पर किसान है कि हार नहीं मानता । भूखे पेट भी वह जी हीं रहा है । उसके बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं । पता नहीं कैसा समाज बन रहा है या बना रहे है हम ।

प्रेम का यह गीत

फूल से लदे धान के पौधे

कंठ तक पानी से भरे खेत ।

प्रेम का यह गीत

बस तुम्हारे लिये है

तुम्हारे लिये………

ओ मेरे देश के

हजारों हजार

श्रमजीवी, कर्मयोद्धा, भूमिपुत्र

बस तुम्हारे लिये ।

नहीं गा सकता

यह गीत हर कोई ।

यह गीत उनका है

जो हर दिन मरते हैं

और

फिनिक्स पक्षी की तरह

जी उठते हैं

अपनी ही राख से ।

सोमवार, 28 सितंबर 2009

असमंजस

 

 

तुम हँसती हो

और

हजार – हजार फूल खिल जाते हैं

मेरे जीवन में ।

तुम रोती हो

और

फैल जाता है  अँधेरा

दूर -  दूर तक

मेरे जीवन में ।

और

जब तुम चुप रहती हो

निर्वात से भर जाती है

मेरी आत्मा ।

न जाने तुम

क्या चाहती हो ?

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

टोपीयां

 

 

 

बहुत हीं शांत, सौम्य और सज्जन

पुरुष थे वे लोग ।

और

पहने हुए थे

सच से भी ज्यादा

साफ़ और स्वच्छ कपड़े ।

लोगों को पहनाया करते थे

अपनी सफ़ेद टोपीयां ।

लोग आज भी

टोपीयां पहने हुए

पाये जाते है ।

 

 

 

                           (तस्वीर http://ngodin.livejournal.com से ली गयी है)

बुधवार, 23 सितंबर 2009

बंद पानी की बोतल

 

                             (गांव में ली गयी तस्वीर)  

 

उस साल

जब सूखा पड़ा था

मेरे गांव में ।

कुछ लोग आये थे

साफ आसमान से ।

बंद पानी की बोतल

बांट रहे थे वे ।

कह रहे थे

स्वच्छ, साफ और कीटाणुरहित

होता है यह जल ।

कीटाणु की जगह

लोग मर रहे थे 

भूख से  ।

बहुत ज़्यादा बारिश हुयी थी

उस साल

सूखे के बाद ।

बंद पानी की बोतल का

एक कारखाना और खुल गया था

मेरे गांव में ।

शनिवार, 19 सितंबर 2009

दो मैथिली अगड़म-बगड़म !!!!!

               (फोर्ट कोच्चि में लिया गया फोटो)

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माछ- भात तीत भेल

दही- चिन्नी मिठ्ठ भेल

खाकऽऽ टर्रर छी     ।

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कारी मेघ

कादो थाल

झर झर बुन्नी

चुबैत चार

 

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(चिन्नी= चीनी, मिठ्ठ= मीठा, कारी= काला, बुन्नी= बरसात, तीत= तीखा, चुबैत= टपकना, चार= छप्पर)

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

अपना हीं घर वह तो नहीं

 

गमगीन है हर आदमी

क्यों खो गया सुख चैन ।

क्यों रोकता कोई नहीं

इस जंग को तूफान को ।

क्यों बह रहा है नालियों में

खून मेरे अपनो का ।

शाख  पर जो स्वप्न थे

क्यों झड़ गया वह पर्ण है ।

क्यों हो रहा नंगा यहाँ सब

कैसी मची हुरदंग है ।

जो चले थे हम जलाने

आंगन किसी और का ।

वह दूर से उठता धुँआ

अपना हीं घर वह तो नहीं ।

क्यों सड़क है सुनसान

क्यों गलियाँ है खामोश ।

यह शहर अब

जिंदा लोगो की

कब्रगाह बन चुकी है ।

(चित्र गूगल सर्च से)

 

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

पथभ्रष्ट

 

अपनी मुक्ति का मार्ग

ढूँढते हुऐ

यहां तक

आ पहुँचे थे

वे लोग ।

पूछ रहे थे

पता ।

कौन सा

मार्ग

बताता 

पथभ्रष्ट  मैं । 

जो मार्ग

बताया मैनें

वह ले गयी उन्हें

स्वंय तक ।

अब वे भी

मेरी तरह

पथभ्रष्ट हैं ।

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

मुक्ति का मार्ग

Image237

                                

 

 

 (संत तिरुवल्लुवर की प्रतिमा और विवेकानंद रॉक मेमोरियल, पीछे से सुर्योदय का दॄश्य)

 

 

खरीददार हूं मैं,

खरीदता हूँ मैं,

सबकुछ,

तुम्हारी,

आत्मा, शरीर, मन ।

 

मैं खरीदता हूँ,

समय और आकाश,

ताकि तुम,

पहुँच न सको,

अपनी उर्जा के स्रोत तक ।

 

क्या बेचोगे,

अपने आप को तुम ?

जो भी मूल्य लगाओ,

मैं खरीद लेता हूँ ।

 

मैं खरीदता हूँ,

ताकि तुम देख न सको,

अपनी आँखो में छिपे हुये,

कुछ निशान ।

क्या कोई देख सकता है,

स्वंय अपनी आँखो में ।

 

सदियों पहले तुमनें बेचा था,

स्वंय को,

मेरे हाथो,

ताकि बची रह सके,

तुम्हारी आने वाली पीढ़ी ।

पीढ़ी - दर - पीढ़ी,

न जाने कब से,

यही चलता आया है ।

 

ढूँढ रहे हो युगों से,

तुम मुझे,

कि,

अगर मैं मिल जाऊं,

तो अपना मूल्य,

वापस कर सको मुझे.

पा सको,

अपनी मुक्ति,

मुझसे ।

 

अब तक तो तुम,

भूल भी चुके हो,

कि बिके हुये हो

तुम ।

कैसे ढूँढोगे अपनी,

मुक्ति का मार्ग ?

 

मुझे पता है,

सबकुछ पता है ।

पर,

नहीं बता सकता मैं ।

 

युगों युगों से,

ढूँढ रहा हूँ,

मैं भी,

अपनी मुक्ति का मार्ग ।

शायद मैं तुम्हारा ईश्वर हूँ,

या तुम मेरे I

 

 

(आज उड़न तश्तरी पर आदरणीय समीर लाल जी की पोस्ट पढी "कैसा ये कहर!" । सोचा क्यों न मैं भी विंडोज़ लाईव राइटर पर लिखने का प्रयास करुं। वाकई में ब्लाग लेखन के लिये यह बहुत हीं मजेदार और सुविधाजनक औजार है। उन्हीं के शब्दो में भूल चूक लेनी देनी।)

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

रे मानव कब तक तू निज को अहं की बलि चढ़ायेगा




कर दो बन्द मुख द्वंद का,
अब सहा नहीं जाता।
थक गया हूँ,
चूर - चूर हो गया हूँ,
अब रहा नहीं जाता।


भागता रहा वर्षो तक,
इस काली रेखा के पीछे,
जब आँख खुली मेरी,
बचे थे हाथों में मेरे,
चंद रेत के कण।


निशाचर बना,
पिचाश बना,
अपनी अग्नि से,
सबको जलाया,
मानवता कराह उठी।


मैं खुश हुआ,
इसलिये कि,
रक्त बह गया है,
आग जल गया है।


पर मिला क्या मुझे,
आज स्वंय इस आग में,
जल रहा हूँ।


शपथ लेता हूँ मैं,
अब युद्ध न होने दूँगा,
शपथ लेता हूँ मैं,
निज रक्त का कण - कण बहा दूँगा।


अब झुक सकता नहीं,
अब रुक सकता नहीं,
विश्वास नया जग गया,
उमंग नया भर गया।


जगह नहीं हृदय में,
द्वेष का द्वंद का,
कलह का,
दुर्गन्ध का।


विचार नया रचित हुआ,
पर्ण नया पल्लवित हुआ
कुविचार अब समाज का,
क्षणों में विघटित हुआ।


समता का बीज बो,
विकास की ओर बढे़,
भुजाओं में शक्ति है,
सौंदर्यमय सृष्टि रचे।


रे मानव कब नवगीत तू गायेगा,
रे मानव कब तक तू निज को ,
अहं की बलि चढ़ायेगा।


(२००१)



गुरुवार, 20 अगस्त 2009

परिवर्तन














रोका था,
तुमनें मुझे

जब मैनें,
कोशिश की थी,
रोने की

कहा था तुमनें,
मत बर्बाद करो,
इन आँसुओ को,
मेरे लिये

बचाकर भी नहीं,
रख पाया था,
मैनें इन्हें

खर्च कर दिये थे,
सारे के सारे

अब,
जबकी तुम नहीं हो,
नहीं भींग पाती है,
मेरी आखें

बहुत ,
कोशिश करने के,
बाद भी




(चित्र साभार- अरुण कुमार)



मंगलवार, 18 अगस्त 2009

मैनें उसको देखा पथ पर







मैनें उसको देखा पथ पर,
लुढ़का पड़ा था नाली पर,
कपड़े थे उसके तितर-बितर,
पर..............................


ध्यान न गया किसी का उसपर,
कवियों की कलमें टूट गयी पर,
रंग डाले सारे पन्ने पर,
पर.......................


नजर न डाली किसी ने उसपर,
पड़ा रहा उसी भाँति वह पथ पर,
उसकी हालत थी अब बदतर,
पर...............................


झपट पड़ा कुत्ता भी उसपर,
ले गया आधा वह भी बांटकर,
शांत रहा वह आधे पेट का आधा भरकर,
पर............................................


अपनी गुदड़ी में घुसकर,
रात बितायी ठिठुर - ठिठुर कर,
सुबह चला फिर अपने पथ पर,
पर................................


(२९ दिसम्बर १९९९)


(चित्र साभार- गूगल सर्च)


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