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बुधवार, 2 दिसंबर 2009

न जाने क्यों

तुम्हारी गीली खुशबूDSC01495

भरती गयी

अन्दर तक

मेरे फेफड़ों में ।

विसरित होती गयी

धमनियों में ।

न जाने क्यों

बहुत हीं तकलीफ़ होती है

आजकल

सांस लेने में ।

आदमी इतनी आसानी से

मरता भी क्यों नहीं ।

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