सोमवार, 20 अप्रैल 2015

दूरी आदमी - आदमी के बीच की

आदमी को देखो

चाँद पर चला गया है वह ।

और कहता है

उससे भी आगे जाने की

फिराक में है वह ।

उसके दूत निकल चुके  है

अंतरिक्ष की अनंत सैर  को

पृथ्वी और सूर्य की

संधी से बाहर

असीम संभावनाओं  की तलाश में ।

प्रकाश की गति को

प्राप्त कर लेना चाहता है आदमी

और वह सफल भी होगा  ।

बस आदमी और आदमी का विज्ञान

नहीं कर पाया तय दूरी

आदमी - आदमी के बीच की ।


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बुधवार, 15 अप्रैल 2015

समय की स्याही

वह धोता है अपनी तलवार

रक्त की ऊष्मा से ।

वह चुनता है सत्य को

ताकि समय की स्याही

उसे याद रख सके  ।

किन्तु बच नहीं पाता वह भी

समय द्वारा

खण्डहर होने से  ।



मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

मैं भाग रहा था ।

साँझ हुई थी

सब चुप थे ।

कहीं बूँद गिरी थी

बादल पिघले थे ।

चुप चाप खड़ा

सहमा सा था ।

न जाने कब से

खुद से ही

मैं भाग रहा था । 



रविवार, 10 मार्च 2013

सौ रुपये


“साहब सौ रुपये चाहिये !!!”
अपने झोले से खाली बोतल निकालकर मेरे सामने कर दिया उसने |
“साहब घर में तेल खत्म हो गया है, खाना नहीं बना अभी तक” |
रात के करीब नौ बज रहे थे |

“अरे अभी कल ही तो सौ रुपये दिये थे, सफाई के”
“वो तो खर्च हो गये”,
“सामान कितना मंहगा हो गया है साहब” |

“ठीक है, दारू – वारू तो नहीं पी लोगे ?”
“नहीं नहीं साहब” – जीभ काटकर उसने कहा |

सौ का नोट निकालकर उसके हाथ में रख दिया गया |
उसकी आँखें चमकी |
“पर देखो विवार को आकर सफाई कर जाना” |

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“सिर्फ पचास रुपये देने थे उसे भाई”
“हाँ ! लेकिन पूरा घर साफ किया था उसने यार, और बाईक भी धुलवाई थी”

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“अरे तुम तो आते ही रह गये ?, दो महने से घर गंदा पड़ा है”
“इस रविवार को पक्का आ जाना”
“हाँ साहब जरूर आऊँगा ”|

“अपना मोबाईल नम्बर बताओ”
अपने सारे दाँत बाहर निकाल दिये उसने – “साहब मोबाईल कहाँ है अपने पास”
“अच्छा ! – रविवार को जरूर आ जाना”
सौ रुपये की बात नहीं कर पाया उससे |

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अभी जब कमरा साफ करने लगा तो उसकी याद आ गयी या सौ रुपये ने उसकी याद दिला दी  |

मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

अंत में

मैनें देखा नहीं है,

उगते हुए सूरज को वर्षों से ।

छिपकर बैठा है,

प्राचीन शैतान !!!

कोशिश करता हूं जब भी…

कि अपनी आंखे खोलूं,

नींद में डूब जाता हूं मैं ।  

देखता हूं जब भी,

दूर से आते हुए प्रकाश को,

और फ़िर,

विकृत और सिमटते हुए प्रतिबिंब को,

सच की तलाश में जुट जाता हूं मैं ।

मेरी तरह,

कई लोगो नें,

देखा नहीं है उगते हुए सूरज को,

वर्षो से ।

और हम मान बैठे है….

हमें बचा लिया जायेगा ।

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