सोमवार, 17 अगस्त 2015

कांतीभाई

लड़के ने अपनी नयी नयी मूछें कुतरवाई । साथ की कुर्सी पर बैठे मित्र ने अठखेेली की - "गुरू पूरा ही सफाचट करवा लो न " ।

हज्जाम ने आँखे सिकोरकर दोनों  को बारी - बारी से देखा ।


"मरवाओगे क्या " लड़के ने हँसते हुए कहा ।

मित्र मण्डली जोर के ठहाके से गूँज उठी ।

मूंछो को बारिकी से सजा दिया गया ।

टोली में चार पांच लोग थे । किसी ने चेहरे का मसाज करवाया तो किसी के बालों को खूबसूरती से सँवारा  गया ।
हज्जाम ने एक - एक कर सभी को निपटाया ।

मैं आधे घण्टे से अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था ।

शोर के साथ सभी दूकान से बाहर आ गए ।

"क्या सर? दाढ़ी या बाल ?"

ये बगल की कुर्सी पर जो लड़का बैठा था न .…इसके चाचा के कई सारे कारोबार है । महीने का एक से डेढ़  लाख तो सिर्फ पुलिस के पास पहुंचता है । सोचिये कितनी आमदनी होगी । खूब पैसा उड़ाते  है ये लड़के लोग ।

अच्छा ! करते क्या है इनके चाचा ?

अरे सर दारू का कारोबार है और न जाने क्या क्या ।
 
लेकिन लड़के लोग अपने भाई जैसे है । जाखड़ गाँव से यहाँ आये है……१० किलोमीटर दूर से । मेरी ही दूकान पर आते है सब । हमेशा !!!

सबको कांतीभाई ही चाहिए । गर्व का अनुभव किया उसने ।



मंगलवार, 12 मई 2015

अपना इतिहास


 













शब्द मेरे हो या तेरे 
कहानी एक ही लिखी जाएगी । 

साफ़ सफ़ेद पन्नों पर 
आर- पार दिखेगा 

अपना इतिहास ।



सोमवार, 4 मई 2015

विवश आदमी


झुकाता है शीश । 

खूंटे को ही समझता  है
अपना ईष्ट  ।

आँखो पर पट्टियाँ बांधे
लगातार बार -  बार
कोल्हू के बैल की तरह
लगाता  चक्कर  ।

सभ्यता के खूंटे में बंधा
विवश आदमी  ।



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बुधवार, 29 अप्रैल 2015

इश्क की ख़ुशबू



तेरे इश्क की ख़ुशबू

मेरे साँसों में बसती है

कि अपनी रूह से पूछो

मिटा कर खाख कर डाला

खुद को इश्क में तेरे ।