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गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

ऐसा क्यों होता है ?

 

कम नहीं था

वह प्रेम

जो दिया मैंने तुमको ।

माना कि

तुम्हारी कुछ मजबूरियाँ थी ।

पर

चाहती थी मैं भी

सबकुछ बांटना

तुम्हारा दुःख- सुख

और तुम्हारा द्वन्द ।

मानते हो  न तुम

कि

अधिकार था यह मेरा ।

पर तुम्हारा अहम

और तुम्हारी मजबूरी ।

तुम्हारी मजबूरियों से लदे

कंधे पर अपना सिर

रख न पायी मैं

रो न पायी मैं ।

मेरे गर्म आंसू

पिघला न पाये

तुम्हारे जमें हुए खून को ।

शायद यह तुम्हारी महानता थी

या कुछ और ।

अभिशप्त है मेरा जीवन

तुम्हारे इस झूठ को

जीने के लिये ।

माना कि

तुम्हारी परिधि से टूटकर

मै पूर्ण न हो पायी

पर यह सोचो

कितने अकेले

कितने विकल हो

तुम भी

आज तक ।

रह गयी अधूरी मैं

और अधूरे तुम भी

आज तक ।

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