बुधवार, 23 सितंबर 2009

बंद पानी की बोतल

 

                             (गांव में ली गयी तस्वीर)  

 

उस साल

जब सूखा पड़ा था

मेरे गांव में ।

कुछ लोग आये थे

साफ आसमान से ।

बंद पानी की बोतल

बांट रहे थे वे ।

कह रहे थे

स्वच्छ, साफ और कीटाणुरहित

होता है यह जल ।

कीटाणु की जगह

लोग मर रहे थे 

भूख से  ।

बहुत ज़्यादा बारिश हुयी थी

उस साल

सूखे के बाद ।

बंद पानी की बोतल का

एक कारखाना और खुल गया था

मेरे गांव में ।

20 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर रचना लिखा है आपने! दिल को छू गई आपकी ये शानदार रचना!

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  2. बहुत खुब भाई जी। सच्चाई को दर्शाती बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति....

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  3. कड़वा सत्य है .......... आपकी रचना में मनुष्य की त्रासदी को शशक्त ढंग से लिखा है ..........बहुत ही लाजवाब प्रस्तुति ........... सुन्दर .....

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  4. राष्ट्र की प्राथमिकतायें गड्ड-मड्ड होने से होता है यह। वैसे आदमी की भी प्राथमिकतायें गड्डमड्ड हैं।
    आम का चित्र बढ़िया है।

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  5. Mera gaanv yaad dila diya..aise hee lade ped zameen ko chhoote hain..is saal aamko phal lage hee nahee..

    http://shamasansmaran.blogspot.com

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  6. आपकी कविता का दायरा बहुत ही बडा है जिसमे गहराई भी बहुत है गोते लागाने पर कई तरह के भाव निकल रहे है/मै भी शरद भाई के बातो से सहमत हूँ/बेहद खुबसूरत रचना/ऐसी रचनाये कम पढने को मिलती है!

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  7. अलग-अलग परिस्थितियों से जुडी विडंबनाओं को शब्दों का सही जामा पहना दिया तुमने..
    बहुत पैनी अभिव्यक्ति...

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  8. लोकतंत्र में आम आदमी सबसे पहले की बजाए बाद में ही आता हैं .....................हमारी प्राथमिकताये सामंतवादी रही हैं ................चन्दन भाई ..............कविता-कर्म ,और कलम की ताकत का प्रयोग तुम जैसों को ही शोभा देता हैं ..........दिल को तसल्ली हुयी जानकार सही हांथों में कलम पहुच रही हैं ......................मैं काबिल तो नहीं फिर भी मेरा सलाम लेते चलो ............शायद आते-आते काबिलियत इधर भी आ जाए ...................

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  9. Arey! Chandan.......... bahut hi gahri baat likhi hai tumne to................ dil ko chho gayi yeh kavita....................

    bahut hi sahi chitran kiya hai tumne..........

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  10. prakarti bhi ek kavita hai ....
    jiska 'virodhabhaas alankaar' darshaniya hai.

    bus ise padha ja sakta hai kiya kuch nahi !!

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  11. प्रिय चन्दन जी, इस सार्थक लेखन के लिये मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएं!!!!!!!

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  12. मुझे गाँव बहुत अच्छा लगता है,
    पर गाँव में कारखाना नहीं!

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  13. बाजारवाद किस तरह जरुरत को बेचने का मौका नहीं छोड़ता ,खूब बयां करती हैं यह कविता ,भाई बधाई

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  14. बहुत खूब ..बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

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