गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

देखा मैंने

देखा उड़ते धूल कोDSC02305

कि

झूमते बबूल को

छांव में जो पल रहे

तृण, कर रहे अठकेलियां

वह भी जले वह भी मिटे

बच न सके ताप से ।

देखा जलते हुए तन को

और

घर्षण करते मन को

बूँद-बूँद टपकते,

और

खत्म होते समय को,

देखा पास आते प्रलय को ।

देखा सृजित होते , नष्ट होते

तीव्र सूक्ष्म कणों को

और

पराजित होते नियम को ।

अपनी हीं तलाश में

विकल और विक्षिप्त,

और

देखा आँखों से झड़ते

अश्रु कण को ।

9 टिप्‍पणियां:

  1. देखा सृजित होते , नष्ट होते
    तीव्र सूक्ष्म कणों को
    और
    पराजित होते नियम को ....

    इसी जीवन में सब कुछ दहा जाता है .... ग्यान का ख़ज़ाना है ये जीवन ... अच्छा लिखा .....

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  2. नियम जब पराजित होते हैं तो
    पर यह पराजय कहीं जय का सूत्रपात भी हो सकता है

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  3. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

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  4. सार्थक और सुंदर अभिव्यक्ति के साथ.... सुंदर रचना....

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  5. कुछ भी अज़र अमर नहीं..हर किसी को नष्ट होना है..जो आयेगा वो जायेगा इसमें दो राय नहीं..आँखों में आये आंसू भी पल भर में मिट जाते है..

    देखा आँखों से झड़ते

    अश्रु कण को ।कही दूर ले गयी आपकी रचना..

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  6. नश्वर संसार में कुछ शाश्वत को पा लेने की छटपटाहट...घर्षण ...सुंदर भाव बोध ।

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  7. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

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