कि
झूमते बबूल को
छांव में जो पल रहे
तृण, कर रहे अठकेलियां
वह भी जले वह भी मिटे
बच न सके ताप से ।
देखा जलते हुए तन को
और
घर्षण करते मन को
बूँद-बूँद टपकते,
और
खत्म होते समय को,
देखा पास आते प्रलय को ।
देखा सृजित होते , नष्ट होते
तीव्र सूक्ष्म कणों को
और
पराजित होते नियम को ।
अपनी हीं तलाश में
विकल और विक्षिप्त,
और
देखा आँखों से झड़ते
अश्रु कण को ।
देखा सृजित होते , नष्ट होते
जवाब देंहटाएंतीव्र सूक्ष्म कणों को
और
पराजित होते नियम को ....
इसी जीवन में सब कुछ दहा जाता है .... ग्यान का ख़ज़ाना है ये जीवन ... अच्छा लिखा .....
नियम जब पराजित होते हैं तो
जवाब देंहटाएंपर यह पराजय कहीं जय का सूत्रपात भी हो सकता है
बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......
जवाब देंहटाएंसार्थक और सुंदर अभिव्यक्ति के साथ.... सुंदर रचना....
जवाब देंहटाएंबेहतरीन भावाव्यक्ति!
जवाब देंहटाएंकुछ भी अज़र अमर नहीं..हर किसी को नष्ट होना है..जो आयेगा वो जायेगा इसमें दो राय नहीं..आँखों में आये आंसू भी पल भर में मिट जाते है..
जवाब देंहटाएंदेखा आँखों से झड़ते
अश्रु कण को ।कही दूर ले गयी आपकी रचना..
hmmm... ashru kan ke maadhyam se jeevan darshan... achha laga..
जवाब देंहटाएंनश्वर संसार में कुछ शाश्वत को पा लेने की छटपटाहट...घर्षण ...सुंदर भाव बोध ।
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ।
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