बुधवार, 11 नवंबर 2009

चुप हो जाओ

 

 

 

 

 

 

 

 

 

कि एक हवा चली है

चुप हो जाओ

बह जाओ  ।

कि एक फूल खिला है

चुप हो जाओ

खिल जाओ ।

कि एक दीप जला है

चुप हो जाओ

जल जाओ ।

कि एक बादल निकला है

चुप हो जाओ

बरस जाओ ।

कि एक पत्ता टूटा है

चुप हो जाओ

खो जाओ ।

कि एक सूरज निकला है

चुप हो जाओ

भर जाओ ।

कि एक प्रेम मिला है

चुप हो जाओ

झुक जाओ ।

10 टिप्‍पणियां:

  1. कि एक दीप जला है
    चुप हो जाओ
    जल जाओ ।
    कि एक बादल निकला है
    चुप हो जाओ
    बरस जाओ ।


    chandan ..........bahut hi khoobsoorat kavita.....

    pravaahmayi......aur dil ko sukoon dene wali....

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  2. सुन्दर !! अंतिम दो-तीन भागों में चन्दन जी थोड़ी जल्दी में दीख पड़ते हैं...सुन्दर..!!!

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  3. ....
    ki 'chandan' mehak uthaa hai,
    bhar lo apanee saanson men !

    Aese hee mehkte rahen .

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  4. कि एक प्रेम मिला है
    चुप हो जाओ
    झुक जाओ ..

    YA HAATH BADHA KAR CHOO LO US PREM KO ... ANGIKAAR KAR LO US JAZBE KO ... SUNDAR RACHNA HAI ...

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  5. चुप हो जाओ की चन्दन की खुशबु वातावरण को सुगन्धित कर रही है .....
    बधाई हो आपको

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  6. आपकी कविता मे हमेशा एक सुरीली सी रवानी होती है..एक लय..जैसे कि कोई मालाकार उपवन के सबसे सुंदर और अलग रंगों के फ़ूलों को गूँथ कर एक वेणी सी तैयार करे..
    ..एक खुशबूदार कविता के लिये आभार !!!

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  7. हवा के बहने
    फूलों के खिलने
    पत्ते के टूटने का एहसास जिसे होता है
    वही चुप होने की बात कर सकता है
    चुप हो जाने का अर्थ है मौन हो जाना
    और मौन में ही प्रेम की गूँज सुनाई देती है।

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  8. भोर की लालिमा से सांझ की कालिमा तक का सफर अच्छा लगा।

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