रविवार, 10 मई 2009

रेगिस्तान

देखा हुआ सच,
किनारे से किनारे तक,
दूर तक फ़ैला हुआ

रेत की तरह,
शुष्क
तपती धूप में जलता हुआ

किसे पता है यह सच,
जो किसी को नही पता

मुझे पता है
मुझे मालूम है

दूर तक जाना है मुझे,
इन प्रतिबिंबो पर पैर रखते हुए
क्या टिके रहेगे मेरे पांव,
इन आधारो पर

क्योकि फ़ैल रहा है यह,
रेगिस्तान

29 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर रचना । धन्यवाद ।

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  2. दूर तक जाना है मुझे,
    इन प्रतिबिंबो पर पैर रखते हुए।
    क्या टिके रहेगे मेरे पांव,
    इन आधारो पर ।

    सुन्दर रचना ....!!

    जवाब देंहटाएं
  3. achhi kavita hai. aapki jaankaari ke liye, main bhi patna men rahta tha aur mera ghar Sitamarhi jile men hai.aapka blog dekh kar achchha laga. likhte rahiye.

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  4. jजीवन को सँघर्श् मान जो चल पडते् हैं बाँध कफन
    नहीं डोलते हार जीत से नही देखते शीत तपन
    नहीं डरते कठिनाईयों से ना दुश्मन से घबराते हैं
    वही पहुँचते मंजिल पर देश का गौरव कहलाते हैं
    बहुत अच्छी रचना है बस चलते रहिये शुभकामनायें

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  5. क्या टिके रहेगे मेरे पांव,
    इन आधारो पर ।
    क्योकि फ़ैल रहा है यह,
    रेगिस्तान।


    सच कहा आपने, आपके ही नहीं सभी के पैर नहीं टिक सकेंगे इस बढ़ते हुए संस्कारित रेगिस्तान में

    सुन्दर भावव्यक्ति पर आभार


    चन्द्र मोहन गुप्त

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  6. bahut acchi rachna.....mere blog main aane ke liye dhanyawaad

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  7. आपकी सुंदर टिपण्णी के लिए धन्यवाद!
    बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने! मैं दो साल राजस्थान में थी और आपकी रचना पड़कर कुछ षणों के लिए मैं जैसलमेर पहुँच गई थी!

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  8. रेत की तरह,
    शुष्क।
    तपती धूप में जलता हुआ
    सच मुच .........रेगिअतान तो ऐसा ही होता है...........सही कहा...........दूर तक जाता है इंसान इस जिंदगी के रेगिअतान पर भी ....खूबसूरत लिखा है

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  9. बहुत खूबसूरती से लिखी हुई रचना

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  10. बहुत उम्दा और गहन भाव हैं इस रचना के, मित्र. बधाई.

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  11. ret par paanv tikane ke liye paanv jamane behad jaruri hote hain.....par aapne to ret par ek sundar rachna likhi daali hai....

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  12. Bahut bahut umda rachna..
    Bahut gehraai hai isme..

    Aapke blog ka naam bhi bahut pyaara laga hamein.. :)

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  13. आजकल रिश्‍तों में भी रेगिस्‍तान की रेत फैलती जा रही है।

    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  14. --------------------
    इस कविता के समानांतर
    छुपी हुई कविता तो यही कह रही है कि
    किसी भी तरीके से इस रेगिस्तान को रोकना है!
    ------------------------------------
    प्रकृति और अंतर दोनों के!
    ---------------------
    प्रकृति के रेगिस्तान को तो पेड़-पौधे लगाकर रोका जा सकता है,
    पर मन के रेगिस्तान को ... ... .
    --------------------------------

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  15. apkee har kavita men abhivyakt bhav samvednayen...aisee hain jinjen bar bar padhne ka man hota hai.achchhee kavitayen.
    Poonam

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  16. चन्दन भाई अच्छी कविता है,समकालीन कविता मे शिल्प पर थोडी मेहनत और ज़रूरी है

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  17. chandan ji bahut sundar likha hai aapne.main aapse guzarish karta hu ke aap k pas koi sangarhs ya prerna se bhari koi kavita ho to mere blog k lie bheje.bahut khubsurat likha hai aapne.jitni tareef ki jaye kam hai. kabhi mere blog par bhi aayen.
    www.salaamzindadili.blogspot.com

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  18. pair bilkul thame rahenge, bas khayaal rakhiyega apne purane dino ka, unka jinhone aapke liye duayen ki hain..aap jaroor paar jayenge ..achha likhte hain..

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  19. अच्छी रचना के लिये बधाई स्वीकारें

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  20. mujhe aapke es rachna me aage badhne ka jajba dikhta hai

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  21. Badhte registan ko ham na rokenge to apne sir pe kadee dhoop hee payenge..ek boond namee ke liye taras jayenge...aasmaan aur aankhen dono tab khushk ho jaye..!Behad samvedansheel rachna hai...

    http://kavitasbyshama.blogspot.com

    http://shamasansmaran.blogspot.com

    http://lalitlekh.blogspot.com

    http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.blogspot.com

    http://shama-kahanee.blogspot.com

    http://shama-baagwaanee.blogspot.com

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  22. मत काटो इन्हें !!
    मत काटो इन्हें, मत चलाओ कुल्हाडी
    कितने बेरहम हो, कर सकते हो कुछभी?
    इसलिए कि ,ये चींख सकते नही?

    ज़माने हुए,मै इनकी गोदीमे खेलती थी,
    ये टहनियाँ मुझे लेके झूमती थीं,
    कभी दुलारतीं, कभी चूमा करतीं,

    मेरे खातिर कभी फूल बरसातीं,
    तो कभी ढेरों फल देतीं,
    कड़ी धूपमे घनी छाँव इन्हीने दी,

    सोया करते इनके साये तले तुमभी,
    सब भूल गए, ये कैसी खुदगर्जी?
    कुदरत से खेलते हो, सोचते हो अपनीही....

    सज़ा-ये-मौत,तुम्हें तो चाहिए मिलनी
    अन्य सज़ा कोईभी,नही है काफी,
    और किसी काबिल हो नही...

    अए, दरिन्दे! करनेवाले धराशायी,इन्हें,
    तू तो मिट ही जायेगा,मिटनेसे पहले,
    याद रखना, बेहद पछतायेगा.....!

    आनेवाली नस्ल्के बारेमे कभी सोचा,
    कि उन्हें इन सबसे महरूम कर जायेगा?
    मृत्युशय्यापे खुदको, कड़ी धूपमे पायेगा!!
    शमा

    Ye aapke liye...

    जवाब देंहटाएं
  23. दूर तक जाना है मुझे,
    इन प्रतिबिंबो पर पैर रखते हुए।
    क्या टिके रहेगे मेरे पांव,
    इन आधारो पर ।
    Chandan bauwa,
    bahut hi jyada sundar likha hai tumne..bas man khush ho jata hai tumko padh kar.
    asheerwaad.
    didi

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  24. कल 10/10/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  25. शब्दों से सजीव चित्रण किया है
    प्रशंसनीय...।

    जवाब देंहटाएं

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