रविवार, 13 जून 2010

मेरे अतीत का आँगन

आह !!!

कैसा है यह दुःसाहस,

देखता हूँ मुड़कर मैं,

अपने अतीत के उस खण्डहर को,

अपने आँगन में,

सर झुकाए मैं खड़ा था ।

टूट रहा था विश्वास,

खत्म हो रहे थे सारे सम्बन्ध,

मेरे मन के उस आँगन में ।

और

मिट चुकी थी

भविष्य की रेखाऐं

मेरे छोटे-छोटे हाथों से ।

मुझे याद नहीं,

माँ का आँचल

जहां मैं अपने आँसू पोछ सकता ।

मुझे अब याद नहीं,

पिता का नर्म स्पर्श ।

मेरा बचपन,

टूट रहा था ।

और मैं-

सर झुकाए आज भी खड़ा हूँ

अतीत के उस आँगन में ।

बुधवार, 9 जून 2010

क्यों…?

खाली रह जाता हूँ मैं,

बार-बार ।

जितना भी तुम भरती हो,

मैं खाली होता जाता हूँ ।

तरल होता जाता हूँ,

पल-पल,

हमेशा,

मैं ठोस होने की कोशिश में ।

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

अगले जनम मोहे कौआ न कीजो

कौवा रोज शाम को यूनिवर्सिटी ग्राऊंड में दौड़ने के लिये जाता हूँ । मैदान के चारो तरफ ऊँचे-ऊँचे पेड़ लगे हुए है । आज कैम्पस में यूथ फ़ेस्टिवल का अंतिम दिन था तो कुछ छात्र पटाखे इत्यादि फ़ोड़ रहे थे । इन पटाखों की आवज से डरकर सैकड़ो नहीं हजारों कौवे पेड़ से उड़कर इधर-उधर काँव-काँव करते हुए मंडराने लगे । मैनें ज़िन्दगी में पहली बार इतने कौवो को एक साथ देखा । मैं तो हतप्रभ था । आखिर इतने कौवे आये कहाँ से ?    आज जब पर्यावरण प्रदूषण के कारण बहुत से जीव जब विलुप्त होने की कगार पर है, क्या ये कौवे विलुप्त नहीं हो रहे है ? क्या ये इन्डेंज़र्ड नहीं है ? बाघ जैसा जानवर विलुप्त होने की कगार पर है । गौरैया पक्षी अब बहुत कम दिखाई देती है । बाघ (या किसी भी जीव का) का फ़ूड चेन में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान होता और यह सोचकर डर होता है कि इनके विलुप्त हो जाने से कितनी जटिल समस्या उत्पन्न होगी/हो रही है । बचपन की याद आती है कि किस तरह तिकड़म लगाकर गौरैया को पकड़ते थे और उसे लाल-हरा-पीला अनेक रंगो से रंगकर उड़ा देते थे । इस कार्य में कितना आनंद आता था । देखिये विषयांतर हो गया । कर रहे थे बात कौओ की और आ गये कहाँ ।

तो मुझे लगता है ये सारे कौवे भागे हुऐ कौवे है और गाँव-देहात छोड़कर शहर आ बसे है । सोचा होगा शहर में आकर दाना-पानी-आवास की सुविधा मिलेगी । अब यहाँ आकर कर रहे है कौवामारी । आदमियों ने तो इनकी रात की नींद तक हराम कर रखी है । पर कौवा बहुत हीं एडज़स्टेवल जीव होता है, और इनकी एकता तो देखने वाली होती है । मुझे तो लगता है आदमी विलुप्त हो जाये पर ये बचे रहेंगे । क्या बाढ़, क्या सुखाड़, क्या पर्यावारण प्रदूषण, जबर्दस्ट ईम्यूनिटी होती है इनमें । मैनें सुना है कि महाभारत युद्ध के बाद कई दिनों या कहिये कई महिनों तक कौवो, चीलों और गिद्धों की पार्टी चली थी । अब गिद्ध और चील तो नजर नहीं आते पर कौवा अभी तक बचा हुआ है । कौवा अभी तक ईवोल्यूट करता आया आगे भी करता रहेगा । तो कौवा बचा रहेगा ।

खैर बात जो भी हो इस कौवा पक्षी से अपनी कभी नहीं बनी । बचपन में एक बार एक ऊँचे नीम के पेड़ पर दांतुन तोड़ने के लिये चढ़ गया था, बिना यह जाने कि उस पेड़ पर कौवा ने घोंसला बना रखा है । सिर मुड़ाया और ओले पड़ने वाली बात तो यह हुई कि घोंसले में उस कौवे ने अण्डे दे रखे थे । पेड़ के उपर चढ़ते–चढ़ते ही 10-20 कौवो ने मेरे उपर आक्रमण कर दिया । किसी तरह पेड़ से उतरकर मैं भाग खड़ा हुआ । पर कब तक मैं घर के अंदर रहता, दिन का आधा समय तो मैं छत पर या अमरूद के पेड़ पर बिताया करता था । बहुत हीं मुश्किल समस्या उतपन्न हो गयी थी । स्कूल जाने के लिये घर से निकलता तो कौवे बस स्टेण्ड तक मेरा पीछा करते । कई बार कौवो के चोंच से अपने सर पर चोट भी खायी । मेरी स्थिती “न घर का न घाट का” वाली हो गयी थी । करीब 10-15 दिनों तक यह स्टार वार चलता रहा । आखिर कौवे भी तो आकाशीय जीव ही है। कौवो नें इस मैटर को बहुत ही पर्सनली लिया था शायद । खैर किसी तरह ये यह युद्ध खत्म हुआ । और मैं अब पुनः अपने दिन का आधा समय अमरूद के पेड़ पर बिता सकने के लायक हुआ । उसके बाद मैनें कभी कौवो से पंगा नहीं लिया और उनसे दूर हीं रहा ।

सालों बाद इन कौवों ने बचपन की याद दिला दी । अब तो ये कौवे दोस्त की तरह लगते है, हालंकि अभी भी दूरी बनाकर ही रखता हूँ । अब मुझे पता है ये पर्यावरण के अच्छे दोस्त है । कौवा बहुत काम का जीव है । पर्यावरण में फैला बहुत सारा कूड़ा-करकट-कचड़ा तो यह अकेले ही साफ़ कर देता है । इन कौवो की हमें बहुत जरूरत है खासकर शहरों में तो और भी ज्यादा । अभी भले हीं इनकी संख्या ठीक ठाक लग रही हो पर मनुष्यों  की प्रगति  यूँ हीं जारी रही तो ये कौवे भी एक दिन बाघ बन जाएगें और फ़िर समाचारपत्र में विज्ञापन निकलेगा-

SAVE CROW !!!  LEFT ONLY 1811 !!!

कुछ दिनों की सुगबुगाहट और सरगर्मी, उसके बाद सबकुछ ठण्डा । कुछ लोग ईनाम जीत लेंगे कुछ प्रतियोगिता करवाकर पब्लिशिटी । भविष्य में ये कौवे “कौआ और कंकड़” वाली कहानी के ज़रिये याद रखे जायेंगे । सोच रहा हूँ, कौवों की कुछ ताजा तस्वीर अपने कम्प्यूटर में सेव करके रख लूँ । एक घड़ियाली आँसू और सही ।

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

कॉलेज के दिन…….याद आएँगे……

आज कॉलेज का अंतिम दिन था । कुछ दिनों में फाईनल परिक्षायें होंगी, उसके बाद हम सभी छात्र अपना बोरिया- बिस्तर बाँध यहाँ से निकल पड़ेगे । चार साल किस तरह बीत गये, कुछ पता हीं नहीं चला । मन दुःखी इसलिये है कि हम सभी दोस्त एक दूसरे से बिछड़ जायेंगे और ना जाने फिर कब मिलना हो । और खुशी इस बात की कि अब 6-6 घंटे की उबाऊ  कक्षाओं से मुक्ति मिल जायेगी । हमारे जूनियर्स, हमारी विदाई अश्रुपूरित नेत्रों से पहले हीं कर चुके है । 19 मार्च को उन लोगो ने हम सभी सीनियर्स के लिये शानदार पार्टी आयोजित की थी । समारोह के अंत में सभी भावुक होकर रोने लगे थे । कुछ तस्वीरें-

 

 

यह आना-जाना, छूटने-बिछड़ने का क्रम तो लगा हीं रहता है । यह बात  हम सभी जानते है, पर यह मन कहाँ मानता है । आगे की ज़िन्दगी हम लोगों की राह देख रही है, ना जाने कैसे-कैसे रास्ते मिलेंगे । कहीं पढ़ा था “बहता पानी निर्मला  । यह पानी कितना निर्मल है यह तो नहीं पता, पर यह ज़िन्दगी बहती रहेगी, पानी की तरह हमेशा ।

 

ज़िन्दगी !!!

मैं तुम्हारे साथ चलना चाहता हूँ

कदम से कदम मिलाकर

बैठा हूँ इंतजार में तुम्हारे

संग चलोगी क्या तुम मेरे ?

फूल मिलेंगे या फिर काटें

तुम्हारे दामन  में

रखूँगा सम्भाल कर उन्हें

बहुत तेज नहीं चल पाऊँगा तो

क्या फिर भी दोगी साथ मेरा तुम

ज़िन्दगी !!!

संग चलोगी क्या तुम मेरे ?

 

कॉलेज और दोस्तों की याद में मेरे दोस्त और रूममेट “नवनीत नवल” ने एक म्युज़िकल एल्बम “कॉलेज के दिन”  बनाई है । इस गीत को नवनीत ने लिखा है और संगीत भी उसी ने तैयार किया है  । गीत को गाया भी नवनीत ने ही है । इस एल्बम का तैयार होना नवनीत के लिये किसी ख्वाब के पूरा होने से कम नहीं है । हम सभी के लिये यह एक बहुत बड़ी बात है । यह गीत हम सभी दोस्तों के लिये कालेज की यादों की एक सच्ची निशानी है, एक उपहार है जिसे हम सभी दोस्त हमेशा गाते रहेंगे और गुनगुनाते रहेंगे । हमेशा याद रखेंगे । यह विडियो देखिये-

 

कॉलेज के दिन-नवनीत नवल

 

ऑडियो आप यहाँ से सुन सकते हैं-

बुधवार, 17 मार्च 2010

सुबह तक

सुबह तक मुझे पसंद नहीं

सूरज का डूबना ।

न जाने कौन सी

एक आग

अन्दर हीं अन्दर

जलती रहती है ।

कण- कण

पिघलता जाता हूँ

सुबह तक

कहाँ बच पाता हूँ । 

सोमवार, 15 मार्च 2010

क्योंकि मैं घबड़ा जाती हूँ तेरी नाराजगी से

दीदी समता की एक रचना-

बगैर आँसू के जो गुलशन हरा न हो,CACLSFCV
भला क्या वास्ता हो उस हरियाली से ।

वो आईना धुँधला ही पर जाये तो बेहतर हो
जो खौफ़ का समां बना दे अपनी सफ़ेदगी से ।

बहुत चाहा, बहुत समझा अपना जिसे,
कैसे नवाज दूँ उसे शब्द अजनबी से ।

तेरी फुरकत में नज़र न आये अपनी भी सूरत,
यही वज़ह है कि मैं बचती फिरती हूँ रौशनी से ।

अगर सँवरते हो सिर्फ़ मेरे लिये तो सँवरना छोड़ दो
क्योंकि मुझे तो मुहब्ब्त है बस तेरी सादगी से ।

जब भी मिलते हो तुम दर्द दिल बयां करते हो
मैं हीं तंग आ चुकी हूँ मुहब्बत की राजगी से ।

मेरी गुस्ताखी के बदले अपनों की तरह शिकायत कर दो,
क्योंकि मैं घबड़ा जाती हूँ तेरी नाराजगी से ।

-(समता झा)

गुरुवार, 11 मार्च 2010

जाल (Trapped)

कॉलेज के कुछ दोस्तों ने मिलकर ५ मिनट की एक छोटी सी फ़िल्म “TRAPPED” बनाई थी । यह उनका पहला प्रयास था ।  बिना संवाद वाले इस फ़िल्म में दिखाया गया है कि किस तरह एक छात्र गलत संगत में पड़कर, अपना जीवन बर्बाद कर लेता है ।

 

 

और हाँ लगे हाथ मैने भी अभिनय में अपना हाथ आज़मा लिया है । बताईये कैसी लगी यह फ़िल्म ? 

सोमवार, 8 मार्च 2010

एक स्तब्ध पेड़

दीदी “समता” की एक रचना-

 

एक स्तब्ध पेड़

पतझड़ सी भंगिमा लिये

एक स्तब्ध पेड़ ।

उसकी निस्तब्धता विच्छिन्न क्यों ?

शायद देखता है,

अपने साथियों को,

सावन आने की खुशी में,

खिलते हुऐ ,

हरियाली दिखाते हुऐ ।

मगर वह क्यों वंचित है,

इन खुशियों से ?

प्रकृति नहीं जानता,

भेद भाव का नियम ।

शायद जानता है कि

छिन्न होने वाले सारे

फेंक आये है अपनी कांति को,

अपने ही हाथों से ।

अविच्छिन्नता पसन्द है इसको,

चाहे अवांछित ही क्यों न हो,

पर इसका एहसास,

कहाँ है इसको ।

शायद यह खुश है कि

हमारे सफर की दूरी छोटी है ।

 

-(समता झा) 

गुरुवार, 4 मार्च 2010

पतझड़

इतने वर्षों के बाद,

मिली तुम आज, इस तरह,

सोचा, खेलूँगा तुम्हारे संग होली,

लगा दूंगा, थोड़ा सा गुलाल,

तुम्हारे गालों पर,

कुछ रंग जा बसेंगे,

तुम्हारी माँग में ।

ढ़ूंढ़ा अपनी पोटली में,

पर रंग कहाँ बचे थे वहाँ ।

शायद पुराने बक्शे में हो,

पर सबकुछ तो,

साथ ले गयी थी तुम ।

बचा क्या रह गया था,

मेरे पास ।

हाँ याद आया,

तुम्हारे जाने के बाद,

अलमारी में पड़ी,

तुम्हारी सिन्दूर की डिब्बी,

फेंक आया था,

पास के तालाब में ।

आज तक सूखी नहीं यह तालाब,

बस मैं हीं पतझड़ हो गया । 

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

कुछ और सँवर गये होते

 

दीदी “समता” की एक रचना-

 

 

फूल

बीते दिनों को याद करते है हम,

वक्त कुछ कम न था,

ओह !!!  कुछ और सँवर गये होते ।

हँसी जो ठहाको में बदल जाती थी,

मगर थी सूखी और बेवजह की,

कुछ वजह होती और मुस्करा लिये होते,

कुछ और सँवर गये होते ।

राहें सुनसान थी मेरी,

मगर एहसास था सुहानेपन का,

काश कुछ समझ होती,

दो चार फूल खिला लिये होते,

कुछ और सँवर गये होते ।

चाँदनी भी निकलती थी अकसर,

हम अँधेरे से खुश थे,

काश, अँधेरे को चाँदनी बना लिये होते

कुछ और सँवर गये होते ।

जब कभी सोचा भी, वह स्वार्थ था, 

न परोपकार था, न आदर्श,

काश हम औरो को समर्पित हो गये होते,

कुछ और सँवर गये होते ।

 

(समता झा)

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

देखा मैंने

देखा उड़ते धूल कोDSC02305

कि

झूमते बबूल को

छांव में जो पल रहे

तृण, कर रहे अठकेलियां

वह भी जले वह भी मिटे

बच न सके ताप से ।

देखा जलते हुए तन को

और

घर्षण करते मन को

बूँद-बूँद टपकते,

और

खत्म होते समय को,

देखा पास आते प्रलय को ।

देखा सृजित होते , नष्ट होते

तीव्र सूक्ष्म कणों को

और

पराजित होते नियम को ।

अपनी हीं तलाश में

विकल और विक्षिप्त,

और

देखा आँखों से झड़ते

अश्रु कण को ।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

कुछ बाते इधर उधर की और “वह आदमी”

DSC03290 इस बार बहुत दिनों तक ब्लाग जगत से दूर रहा । पिछली पोस्ट डाले हुए करीब दो महिने हो चुके है । कारण ? कुछ तो इंटरनेट की समस्या, बीच में गांव भी गया था, और कुछ ब्लागजगत से दूर रहने की इच्छा । अगले महिने मार्च में, ब्लागजगत में आये हुए मुझे पूरे एक साल हो जायेंगे । यहाँ आकर कितना सफल रहा यह नहीं जानता या जानने की इच्छा नहीं, परन्तु एक आत्मसंतुष्टि का भाव मन में जरूर व्याप्त है । यहाँ आकर बहुत कुछ पाया है मैंने । अनेक सुजनो से मित्रता स्थापित हुई और मेरी हिंदी भी पहले से अच्छी हो गयी है । 8-9 वर्षों से हिन्दी लिखना बन्द हो चुका था परन्तु पढ़ना नहीं, हिन्दी मैं नियमित रूप से पढ़ता रहा हूँ । ब्लागजगत में आकर हिन्दीं लेखन करना बहुत हीं सु:खद अनुभव रहा है । बहुत सूक्ष्म और अल्प हीं सही पर अपने अंदर रचनात्मकता को पनपता हुआ महसूस कर रहा हूँ ।

अब कुछ बाते गाँव की । गाँव में हमारी एक रिश्ते की बहन है । “समता” दीदी । गणित से एम.एस.सी(M.Sc.) करने बाद अभी वह एल एन मिथिला विश्वविद्दालय, दरभंगा  से  पी.एच.डी.(Ph.D.) कर रहीं है । एक साधारण ग्रामीण परिवार से होकर, गाँव में रहकर (जहाँ सबसे निकटम महाविद्दालय घर से 20 किलोमीटर दूर है) पी.एच.डी. तक का सफर तय करना, वह भी एक लड़की के लिये किसी अति कष्टसाध्य तपस्या से कम नहीं, जबकी/जहाँ ज्यादातर परिस्थितीयाँ अनुकूल नहीं होती । समता दीदी को लिखने-पढ़ने का भी शौक है । इस बार जब गाँव गया था तो उनकी कुछ कवितायें लिखकर ले आया । आज पढ़िये उनकी कविता “वह आदमी”  ।

 

“वह आदमी”

सर पर सफेद बाल,

और

चेहरे पर झुर्रियां ।

लड़खड़ाते हुए कदम,

और

साँस की तेज रफ़्तार ।

उस आदमी को थी आवश्यकता,

दस रुपये की ।

मैं गलती से पूछ बैठी,

क्या है काम ?

हैरत से वह बोला-

“तुम अब तक हो अंजान ?”

मंत्री जी को लगा बुखार,

छा गये सारे रेडियो अखबार,

उनकी बुखार का चर्चा आम,

तो फिर,

मेरा बुखार क्यों गुमनाम ।

मैंने कहा-

गम की कोई बात नहीं है,

और न हीं कोई,

नयी बात हुई है ।

बड़े लोगो की बुखार है,

इसलिये थोड़ी प्रसिद्धी मिली है ।

 

-(समता झा)

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